हर साल अक्टूबर-नवंबर में पंजाब और हरियाणा के खेतों से उठता धुआं दिल्ली-NCR की हवा को ज़हरीला बना देता है। धान की कटाई के बाद बची पराली (फसल अवशेष) को किसान खेत में ही जला देते हैं — यह प्रथा वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। लेकिन पराली जलाना सिर्फ शहरों की समस्या नहीं, यह किसानों की सेहत और उनकी ज़मीन के लिए भी हानिकारक है।
किसान पराली क्यों जलाते हैं?
- समय की कमी: धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच सिर्फ 15-20 दिन का समय होता है। पराली हटाने में समय लगता है, जबकि जलाना सबसे तेज़ तरीका है।
- लागत: पराली प्रबंधन मशीनों का किराया या खरीद छोटे किसानों के लिए महंगी पड़ती है।
- मशीनों की कमी: सभी गांवों में हैप्पी सीडर या सुपर सीडर जैसी मशीनें आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।
- जागरूकता की कमी: कई किसान पराली के वैकल्पिक उपयोगों से अनजान हैं।
पराली जलाने के नुकसान
पराली जलाने से PM2.5, कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य ज़हरीली गैसें निकलती हैं, जो सांस की बीमारियां बढ़ाती हैं। खेत में आग लगाने से मिट्टी के लाभकारी जीवाणु मर जाते हैं और मिट्टी की उर्वरता घटती है। एक अनुमान के अनुसार पराली जलाने से मिट्टी का तापमान बढ़ता है, जिससे अगली फसल की पैदावार पर भी असर पड़ता है।

विकल्प: पराली का बेहतर प्रबंधन
- हैप्पी सीडर/सुपर सीडर: ये मशीनें बिना पराली हटाए सीधे बुवाई कर देती हैं। सरकार इन पर सब्सिडी देती है।
- बायो-डीकंपोज़र: पूसा संस्थान का यह घोल पराली को 20-25 दिन में खाद में बदल देता है।
- पराली से उत्पाद: पराली से बायो-ईंधन, कागज़, गत्ता और पशु चारा बनाया जा सकता है। कई कंपनियां अब किसानों से पराली खरीद रही हैं।
- मल्चिंग: पराली को खेत में बिछाकर नमी संरक्षित की जा सकती है।
सरकारी योजनाएं
केंद्र और राज्य सरकारें पराली प्रबंधन मशीनों पर 50-80% तक सब्सिडी दे रही हैं। कस्टम हायरिंग सेंटरों के माध्यम से किसान कम किराए पर मशीनें ले सकते हैं। पराली न जलाने वाले किसानों को कुछ राज्यों में प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है।
पराली समस्या का समाधान सिर्फ पाबंदी से नहीं, बल्कि किसानों को सस्ते और सुलभ विकल्प देकर ही संभव है। जब पराली आय का स्रोत बनेगी, तो उसे कोई जलाना नहीं चाहेगा।